Class 9 Biology Chapter 5 Notes in Hindi : मानव एवं पर्यावरण (Our Environment) के इस पोस्ट में हम आपको NCERT सिलेबस पर आधारित, सरल, स्पष्ट और बोर्ड परीक्षा के लिए बेहद उपयोगी हिंदी नोट्स उपलब्ध करा रहे हैं। ये नोट्स खास तौर पर CBSE, Bihar Board, UP Board, MP Board और अन्य हिंदी माध्यम के छात्रों को ध्यान में रखकर तैयार किए गए हैं, ताकि वे इस अध्याय को आसानी से समझ सकें और परीक्षा में बेहतर अंक हासिल कर सकें। Class 9 Biology Chapter 5 Notes in Hindi
इस अध्याय में आहार शृंखला, पोषी स्तर (Trophic Levels), ऊर्जा प्रवाह, पारिस्थितिक तंत्र के कार्य, जैव आवर्धन (Biological Magnification), अपशिष्ट प्रबंधन (Waste Management), जैव निम्नीकरणीय एवं अनिम्नीकरणीय अपशिष्ट, ओजोन परत का क्षरण, तथा CFC जैसे रसायनों के प्रभाव को विस्तार से और उदाहरणों के साथ समझाया गया है। सभी महत्वपूर्ण टॉपिक्स को NCERT और बोर्ड परीक्षा पैटर्न के अनुसार तैयार किया गया है, जिससे बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्नों की तैयारी आसानी से हो सके।
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Class 9 Biology Chapter 5 Notes in Hindi Overview

| Board | CBSE Board, UP Board, JAC Board, Bihar Board, HBSE Board, UBSE Board, PSEB Board, RBSE Board, CGBSE Board, MPBSE Board |
| Textbook | NCERT |
| Class | Class 9Th |
| Subject | Science (Biology) |
| Chapter no. | Chapter 5 |
| Chapter Name | Food Resource(खाद्य संसाधन ) |
| Category | Class 9Th Science Notes in Hindi |
| Medium | Hindi |
भोजन (Food)
पौधों तथा जंतुओं से प्राप्त वे सभी पदार्थ, जो मनुष्य के शरीर के निर्माण, सामान्य वृद्धि, ऊर्जा प्राप्ति तथा विभिन्न रोगों से सुरक्षा प्रदान करते हैं, भोजन कहलाते हैं।
भोजन न केवल शरीर को शक्ति देता है, बल्कि शरीर की कोशिकाओं की मरम्मत, नए ऊतकों के निर्माण तथा आंतरिक अंगों के सुचारु कार्य में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भोजन को उसके कार्यों के आधार पर मुख्यतः तीन भागों में बाँटा गया है—
1. शरीर निर्माण पदार्थ
वे पोषक तत्व जो शरीर की कोशिकाओं, ऊतकों, मांसपेशियों और हड्डियों के निर्माण तथा वृद्धि में सहायक होते हैं, शरीर निर्माण पदार्थ कहलाते हैं। इस वर्ग में मुख्य रूप से प्रोटीन तथा कुछ खनिज-लवण जैसे—लोहा, कैल्शियम, मैगनीशियम आदि शामिल होते हैं।
प्रोटीन शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं की मरम्मत करता है और बच्चों की वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक होता है। खनिज-लवण हड्डियों को मजबूत बनाने, रक्त निर्माण तथा दाँतों के विकास में सहायक होते हैं।
मुख्य स्रोत— सभी प्रकार की दालें, सोयाबीन, दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियाँ, फल, अंकुरित अनाज आदि।
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2. ऊर्जा दायक पदार्थ
वे पोषक तत्व जो शरीर को कार्य करने के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं, ऊर्जा दायक पदार्थ कहलाते हैं। इस वर्ग में मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट और वसा (फैट) आते हैं।
कार्बोहाइड्रेट शरीर की प्राथमिक ऊर्जा आवश्यकता को पूरा करते हैं, जबकि वसा अधिक मात्रा में ऊर्जा संचित करने का कार्य करती है। वसा शरीर को ठंड से बचाने और आंतरिक अंगों की सुरक्षा में भी सहायक होती है।
मुख्य स्रोत— गेहूँ, धान, मक्का, बाजरा, ज्वार, आलू, शक्कर, सोयाबीन तेल, मूंगफली, तिल, सूरजमुखी, सरसों, मक्खन, घी, पनीर आदि।
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3. वि-नियंत्रक पदार्थ
वे पोषक तत्व जो शरीर के आंतरिक और बाह्य अंगों की क्रियाओं को नियंत्रित करते हैं, वि-नियंत्रक पदार्थ कहलाते हैं।
इस वर्ग में मुख्य रूप से विटामिन्स तथा कुछ खनिज-लवण जैसे—सोडियम, ज़िंक, पोटैशियम आदि शामिल होते हैं।
विटामिन्स रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं, आँखों, त्वचा और तंत्रिका तंत्र के स्वास्थ्य को बनाए रखते हैं। खनिज-लवण शरीर में जल संतुलन, मांसपेशियों के संकुचन तथा एंजाइम क्रियाओं में सहायक होते हैं।
मुख्य स्रोत— मांस, मछली, अंडा, दूध, हरी सब्जियाँ, मसाले, ताजे फल, अंकुरित बीज आदि।
हरित क्रांति (Green Revolution)
आधुनिक कृषि यंत्रों, संकर बीजों, कृत्रिम उर्वरकों, उन्नत सिंचाई व्यवस्था तथा वैज्ञानिक कृषि तकनीकों के प्रयोग द्वारा कृषि उत्पादन में की गई अत्यधिक वृद्धि को हरित क्रांति कहते हैं।
इस क्रांति के फलस्वरूप विशेष रूप से गेहूँ और चावल की पैदावार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई, जिससे देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भर बना। हरित क्रांति ने किसानों की आय बढ़ाने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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श्वेत क्रांति (White Revolution)
देश में संकर नस्ल की गायों और भैंसों के सफल पशुपालन द्वारा दूध के उत्पादन में की गई वृद्धि को श्वेत क्रांति कहते हैं। इस क्रांति का मुख्य उद्देश्य दुग्ध उत्पादन बढ़ाकर किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ बनाना था।
दूध उत्पादन में वृद्धि के लिए एक विशेष कार्यक्रम चलाया गया, जिसे ऑपरेशन फ्लड कहा जाता है। इस कार्यक्रम के कारण भारत विश्व के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देशों में शामिल हो सका।
रजत क्रांति (Silver Revolution)
उच्च कोटि की संकर नस्ल के कुक्कुटों के पालन-पोषण द्वारा अंडा उत्पादन में की गई वृद्धि को रजत क्रांति कहते हैं। इस क्रांति से अंडों की उपलब्धता बढ़ी तथा कुक्कुट पालन किसानों के लिए आय का एक महत्वपूर्ण साधन बना।
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संपोषणीय कृषि (Sustainable Agriculture)
कृषि का वह तरीका जिसमें पर्यावरण को क्षति पहुँचाए बिना, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करते हुए तथा भविष्य की पीढ़ियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर पर्याप्त मात्रा में भोजन का उत्पादन किया जाए, संपोषणीय कृषि कहलाती है।
इस प्रकार की कृषि में जैविक खाद, फसल चक्र, जल संरक्षण और मृदा संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाता है।
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फसल उत्पादन के लिए आवश्यक परिस्थितियाँ
फसल उत्पादन के लिए मुख्य रूप से दो आवश्यक परिस्थितियाँ होती हैं—
1. दीप्तकालिता
वे परिस्थितियाँ जो सूर्य के प्रकाश की अवधि से संबंधित होती हैं, दीप्तकालिता कहलाती हैं। विभिन्न फसलों की वृद्धि और फूल-फल बनने की प्रक्रिया सूर्य के प्रकाश की अवधि पर निर्भर करती है।
2. तापमान
पौधों की वृद्धि, विकास, सिंचाई तथा उत्पादन उस निकटवर्ती पर्यावरण के तापमान पर निर्भर करता है। तापमान के आधार पर ही विभिन्न ऋतुओं का निर्धारण होता है, जिससे फसलों के बोने और काटने का समय तय किया जाता है।
इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर फसलों को दो भागों में बाँटा गया है—
1. रबी फसल
वे फसलें जो शीत ऋतु में, अर्थात् नवम्बर माह में बोई जाती हैं तथा अप्रैल माह में काट ली जाती हैं, रबी फसल कहलाती हैं। इन फसलों को ठंडे मौसम और कम वर्षा की आवश्यकता होती है।
उदाहरण— मसूर, मटर, जौ, गेहूँ, अलसी, सरसों, मक्का आदि।
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2. खरीफ फसल
वे फसलें जो ग्रीष्म ऋतु में, अर्थात् मई-जून में बोई जाती हैं तथा वर्षा ऋतु के अंत, यानी सितम्बर-अक्टूबर में काट ली जाती हैं, खरीफ फसल कहलाती हैं। इन फसलों को अधिक तापमान और पर्याप्त वर्षा की आवश्यकता होती है।
उदाहरण— धान, ज्वार, बाजरा, पटसन, जूट आदि।
फसल सुधार (Crop Improvement)
उन्नत किस्म के बीजों का प्रयोग करना, फसलों की समय पर सिंचाई, उचित मात्रा में उर्वरकों का उपयोग, कीटनाशकों का संतुलित प्रयोग तथा फसलों को रोगों और कीटों से सुरक्षा प्रदान करना फसल सुधार कहलाता है।
फसल सुधार का मुख्य उद्देश्य उत्पादन की मात्रा बढ़ाना, फसल की गुणवत्ता सुधारना तथा किसानों की आय में वृद्धि करना होता है।
फसल सुधार की प्रक्रिया में यह भी ध्यान रखा जाता है कि फसलें प्रतिकूल परिस्थितियों जैसे—सूखा, अधिक वर्षा, रोग और कीटों का सामना कर सकें।
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पादप संकरण (Plant Hybridization)
विभिन्न पौधों के बीच कृत्रिम प्रजनन के माध्यम से इच्छित गुणों वाले नए पौधों का विकास करना पादप संकरण कहलाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य अधिक उत्पादन देने वाले, रोग-प्रतिरोधी तथा अच्छे गुणों वाले पौधों को विकसित करना होता है।
पादप संकरण मुख्यतः दो प्रकार का होता है—
1. अंतरा किस्मीय पादप संकरण
जब एक ही प्रजाति की दो भिन्न किस्मों के बीच संकरण किया जाता है, तो उसे अंतरा किस्मीय पादप संकरण कहते हैं। इस प्रकार के संकरण से फसल की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता में सुधार होता है।
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2. अंतरा वंशीय पादप संकरण
जब दो भिन्न वंशों के पौधों के बीच संकरण कराया जाता है, तो उसे अंतरा वंशीय पादप संकरण कहा जाता है। इससे ऐसे पौधे विकसित किए जाते हैं जिनमें विशेष और उपयोगी गुण पाए जाते हैं।
फसल उत्पादन को प्रभावित करने वाले कारक
फसल उत्पादन कई प्राकृतिक और मानवीय कारकों पर निर्भर करता है, जिनमें मुख्य रूप से निम्नलिखित शामिल हैं—
- मौसम संबंधी परिवर्तन
- मिट्टी की गुणवत्ता और उर्वरता
- सिंचाई की उपलब्धता और साधन
इन कारकों में अनुकूलता होने पर फसल उत्पादन अधिक और बेहतर होता है।
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फसल उत्पादन में सुधार से संबंधित कारक
फसल उत्पादन को बढ़ाने के लिए निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता है—
- उन्नत किस्म के पौधों का चयन और रोपण करना चाहिए।
- पौधों में जैविक तथा अजैविक प्रतिरोधकता का विचार किया जाना चाहिए।
- फसल के परिपक्वन काल में परिवर्तन कर समय की बचत की जा सकती है।
- पौधों में व्यापक अनुकूलता होनी चाहिए ताकि वे विभिन्न परिस्थितियों में उग सकें।
- पौधों में इच्छित सस्य विज्ञान गुण होने चाहिए।
- फसल से उच्च उत्पादन प्राप्त होना चाहिए।
पोषक प्रबंधन (Nutrient Management)
ऐसी व्यवस्था जिसके अंतर्गत पौधों की उचित वृद्धि और विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्व समय पर और संतुलित मात्रा में उपलब्ध कराए जाते हैं, पोषक प्रबंधन कहलाता है। उचित पोषक प्रबंधन से फसल स्वस्थ रहती है और उत्पादन में वृद्धि होती है।
पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को दो भागों में बाँटा गया है—
1. वृहत पोषक पदार्थ (Macronutrients)
वे पोषक तत्व जिनकी आवश्यकता पौधों को अधिक मात्रा में होती है, वृहत पोषक पदार्थ कहलाते हैं। इनकी कुल संख्या नौ होती है।
उदाहरण— नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम, सल्फर, ऑक्सीजन, कार्बन, हाइड्रोजन।
ये तत्व पौधों की वृद्धि, पत्तियों के विकास, जड़ों की मजबूती और प्रकाश संश्लेषण में सहायक होते हैं।
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2. सूक्ष्म पोषक पदार्थ (Micronutrients)
वे पोषक तत्व जिनकी आवश्यकता पौधों को कम मात्रा में होती है, सूक्ष्म पोषक पदार्थ कहलाते हैं। इनकी कुल संख्या सात होती है।
उदाहरण— लोहा, मैगनीज, बोरॉन, जस्ता, तांबा, क्लोरीन।
ये पोषक तत्व एंजाइम क्रियाओं, फूल-फल बनने तथा पौधों के सामान्य विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पौधे इन सभी पोषक तत्वों को जलीय माध्यम में अपनी जड़ों के द्वारा मुख्य रूप से अवशोषित करते हैं।
खाद (Manure)
ऐसा जैविक पदार्थ, जो जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों के अवशेषों के अपघटन के फलस्वरूप बनता है, खाद कहलाता है। खाद मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता को बनाए रखने में सहायक होती है।
खाद के लाभ
- यह मिट्टी की संरचना अर्थात गुणवत्ता में सुधार करती है।
- यह मिट्टी की जलधारण क्षमता को बढ़ाती है।
- यह भूमि को बंजर होने से बचाती है और सूक्ष्मजीवों की सक्रियता बढ़ाती है।
खाद के दोष
- इसका रखरखाव सुविधाजनक नहीं होता है।
- यह पौधों की वृद्धि और विकास में धीरे-धीरे प्रभाव दिखाती है।
खाद मुख्यतः दो प्रकार की होती है—
- कम्पोस्ट
- हरी खाद
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उर्वरक या संश्लेषित खाद (Fertilizers)
वे रासायनिक पदार्थ, जिनका निर्माण कृत्रिम विधियों द्वारा पौधों की वृद्धि और विकास के लिए किया जाता है, उर्वरक कहलाते हैं। उर्वरक फसलों को आवश्यक पोषक तत्व शीघ्रता से उपलब्ध कराते हैं।
उर्वरक के गुण
- यह पौधों पर अपना प्रभाव तेजी से उत्पन्न करता है।
- इसका रखरखाव तथा परिवहन सुविधाजनक होता है।
- यह खाद की तुलना में कम मात्रा में उपयोग किया जाता है।
उर्वरक के दोष
- इसके अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता में ह्रास होता है।
- यह मिट्टी की जलधारण क्षमता को घटाता है।
- इसका अधिक और लगातार उपयोग भूमि को बंजर बना सकता है।
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सिंचाई (Irrigation)
फसलों की उचित वृद्धि, विकास और उत्पादन के लिए समय-समय पर खेतों में जल की पूर्ति करने की प्रक्रिया को सिंचाई कहा जाता है।
सिंचाई पौधों को आवश्यक नमी प्रदान करती है, जिससे पोषक तत्वों का अवशोषण ठीक प्रकार से हो पाता है और फसल स्वस्थ बनी रहती है।
जल की कमी होने पर फसलों की वृद्धि रुक जाती है, इसलिए कृषि में सिंचाई का विशेष महत्व होता है।
आश्वस्त सिंचाई (Assured Irrigation)
सिंचाई की वह व्यवस्था जिसके अंतर्गत पौधों को साल भर पर्याप्त मात्रा में जल उपलब्ध कराया जाता है, आश्वस्त सिंचाई कहलाती है।
इस प्रकार की सिंचाई में वर्षा पर पूर्ण निर्भरता नहीं होती, बल्कि नहर, कुआँ, नलकूप, ट्यूबवेल आदि साधनों का उपयोग किया जाता है।
फसल की सिंचाई की आवश्यकता फसल के प्रकार और मिट्टी की प्रकृति पर निर्भर करती है। भारत में लगभग 58% कृषि क्षेत्र मानसून पर निर्भर है, जबकि केवल लगभग 18% कृषि भूमि को ही आश्वस्त सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है।
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फसल पैटर्न (Crop Pattern)
किसी कृषि क्षेत्र में फसलों को उगाने के निश्चित क्रम और व्यवस्था को फसल पैटर्न कहा जाता है। फसल पैटर्न क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी की उर्वरता, वर्षा और सिंचाई की सुविधा पर निर्भर करता है।
उचित फसल पैटर्न अपनाने से भूमि का बेहतर उपयोग होता है और उत्पादन में वृद्धि होती है।
फसल चक्र (Crop Rotation)
किसी कृषि क्षेत्र में एक निश्चित समय अंतराल पर फसलों को अदल-बदल कर उगाने की प्रक्रिया को फसल चक्र कहा जाता है। इस पद्धति के अंतर्गत सामान्यतः दो धान्य फसलों के बीच एक दलहनी फसल की खेती की जाती है।
दलहनी फसलें मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर भूमि की उर्वरता बनाए रखती हैं।
फसल चक्र के लाभ
- इससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है।
- इस पद्धति को अपनाने से उर्वरकों की आवश्यकता कम हो जाती है।
- इससे खरपतवारों पर नियंत्रण करना आसान हो जाता है।
- इससे मिट्टी की संरचना में सुधार का अवसर मिलता है।
- इससे पीड़कों (कीड़े-मकोड़ों) के नियंत्रण में भी सहायता मिलती है।
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मिश्रित खेती (Mixed Cropping)
किसी एक ही कृषि क्षेत्र में एक साथ अनेक फसलों को उगाने की प्रक्रिया को मिश्रित खेती कहा जाता है। इस प्रकार की खेती से जोखिम कम होता है और किसान को अधिक लाभ की संभावना रहती है।
मिश्रित खेती में फसलों का चयन करते समय निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना आवश्यक होता है—
- फसलों का परिपक्वन काल अलग-अलग होना चाहिए।
- फसलों की ऊँचाई (लंबाई) भिन्न-भिन्न होनी चाहिए।
- फसलों की जड़ों की बनावट अलग-अलग होनी चाहिए।
- फसलों की जल संबंधी आवश्यकताएँ भी अलग-अलग होनी चाहिए।
फसल सुरक्षा प्रबंधन
विभिन्न कारणों से फसलों को होने वाली क्षति को रोकने के लिए किए गए सभी उपायों को फसल सुरक्षा प्रबंधन कहा जाता है। इसमें खरपतवार, पीड़क, रोग और अन्य हानिकारक तत्वों से फसलों की रक्षा की जाती है।
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खरपतवार या अपतृण (Weeds)
फसलों के बीच अपने-आप उग आने वाले अवांछित पौधों को खरपतवार कहा जाता है। ये पौधे फसलों के पोषक तत्व, जल और प्रकाश को छीन लेते हैं, जिससे उत्पादन में कमी आती है।
उदाहरण— दूब, मोथा, गाजर घास, चौलाई, भतुआ, हिरण सूखी घास आदि।
खरपतवारनाशी (Weedicides)
वे रासायनिक पदार्थ, जिनकी सहायता से खेतों में उगे खरपतवारों को नियंत्रित किया जाता है, खरपतवारनाशी कहलाते हैं। इनका प्रयोग सीमित मात्रा में और सही समय पर किया जाना चाहिए।
उदाहरण— आइसोप्रोट्यूरान, सीमाजीन, 2,4-D, फ्लू-क्लोरीन, टोक आदि।
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पीड़क (Pests)
वे सूक्ष्म जीव, कीड़े-मकोड़े या अन्य जीव जो फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं, पीड़क कहलाते हैं। पीड़क फसलों की पत्तियाँ, तने, जड़ और फल को नुकसान पहुँचा सकते हैं।
उदाहरण— घोंघा, पक्षी, नीलगाय, विभिन्न कीट आदि।
पीड़कनाशी (Pesticides)
वे रासायनिक पदार्थ जो फसलों को क्षति पहुँचाने वाले कीटाणुओं और पीड़कों से फसलों की रक्षा करते हैं, पीड़कनाशी कहलाते हैं। इनका प्रयोग सावधानीपूर्वक और निर्धारित मात्रा में किया जाना चाहिए।
उदाहरण— मेलैथियॉन, डी.डी.टी. (डाइक्लोरो डाइफेनिल), 2-क्लोरो ब्यूटाडाइन आदि।
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अनाज का भंडारण (Storage of Grains)
खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक सुरक्षित रखते हुए, उनकी गुणवत्ता, पोषण मूल्य और उपयोगिता को बनाए रखने की प्रक्रिया को अनाज का भंडारण कहा जाता है।
भंडारण का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि खाद्य पदार्थ खराब न हों और वर्ष भर सभी स्थानों पर उनकी उपलब्धता बनी रहे।
अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों के भंडारण के मुख्यतः दो तरीके होते हैं—
(1) शीत भंडारण (Cold Storage)
अधिक नमी (आर्द्रता) वाले खाद्य पदार्थों को कम तापमान पर सुरक्षित रूप से संग्रहित करने की प्रक्रिया को शीत भंडारण कहा जाता है। कम तापमान पर रखने से सूक्ष्मजीवों की वृद्धि धीमी हो जाती है, जिससे खाद्य पदार्थ लंबे समय तक खराब नहीं होते।
इसके अंतर्गत मुख्य रूप से— साग-सब्जियाँ, फल, मांस, मछली, दूध तथा दुग्ध उत्पादों का भंडारण किया जाता है।
(2) शुष्क भंडारण (Dry Storage)
अत्यंत कम नमी वाले खाद्य पदार्थों को सूखे और हवादार स्थान पर सुरक्षित रखने की प्रक्रिया को शुष्क भंडारण कहा जाता है। इस विधि में खाद्य पदार्थों को नमी, कीट और फफूँद से बचाया जाता है।
उदाहरण— अनाज, दालें, मसाले, सूखे बीज आदि।
अनाज भंडारण का मुख्य उद्देश्य वर्ष भर सभी क्षेत्रों में अनाज की निरंतर और सुविधाजनक उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
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पशुपालन (Animal Husbandry)
भोजन उत्पादन सहित अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पशुओं के पालन-पोषण, देखभाल, प्रजनन और प्रबंधन की वैज्ञानिक प्रक्रिया को पशुपालन कहा जाता है। पशुपालन से दूध, मांस, अंडा, ऊन तथा अन्य उपयोगी उत्पाद प्राप्त होते हैं।
भारत में किए गए नवीन पशु सर्वेक्षण के अनुसार—
- विश्व की कुल भैंसों की संख्या का लगभग 50% भाग भारत में पाया जाता है।
- देश के कुल दुग्ध उत्पादन में भैंसों का योगदान लगभग 50%, गायों का 45% तथा भेड़-बकरियों का 5% है।
भारत दूध उत्पादन में विश्व में दूसरे स्थान पर है, जबकि पशुधन की संख्या के मामले में प्रथम स्थान पर है।
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दूध देने वाली पशुओं की नस्लें
गाय (Cow)
भारत में गायों की कुल लगभग 32 नस्लें पाई जाती हैं, जिनमें कुछ प्रमुख देसी और उन्नत नस्लें शामिल हैं।
देसी नस्लें— लाल सिंधी, साहीवाल, गिर आदि।
उन्नत (विदेशी/संकर) नस्लें— जर्सी, कारन स्विस, होल्स्टाइन-फ्रिसिओन, कारन फ्राइस, फ्रिसिओन-साहीवाल आदि।
ये उन्नत नस्लें अपने लगभग 300 दिनों के दुग्ध स्रवण काल में औसतन 3000 से 5000 लीटर तक दूध देने की क्षमता रखती हैं।
भैंस (Buffalo)
भारत में भैंसों की लगभग 7 प्रमुख नस्लें पाई जाती हैं। इनमें मुर्राह, भदावरी, जाफ़रावादी, सुर्ती, मेहसाणा आदि प्रमुख और उन्नत नस्लें हैं।
ये नस्लें अपने दुग्ध स्रवण काल में लगभग 2000 लीटर तक दूध देती हैं और उच्च वसा युक्त दूध के लिए जानी जाती हैं।
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पशु-आहार (Animal Feed)
पशुओं के स्वास्थ्य, वृद्धि और उत्पादन के लिए संतुलित आहार अत्यंत आवश्यक होता है। पशु-आहार के मुख्यतः चार घटक होते हैं—
(1) रुक्षांश (Roughage)
कम पोषण युक्त, लेकिन अधिक रेशेदार पदार्थ जैसे— पुआल, भूसा, सूखी घास आदि, जिन्हें खाकर पशु अपना पेट भरते हैं, रुक्षांश कहलाते हैं।
(2) सान्द्र पदार्थ (Concentrates)
वे खाद्य पदार्थ जिनमें पोषक तत्व अधिक मात्रा में पाए जाते हैं, सान्द्र पदार्थ कहलाते हैं।
उदाहरण— ज्वार, बाजरा, मक्का, चना, खली आदि।
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(3) खनिज पदार्थ (Minerals)
कैल्शियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम आदि खनिजों से भरपूर पदार्थ खनिज पदार्थ कहलाते हैं। इनसे पशुओं की हड्डियों, दाँतों, सींगों और खुरों का उचित विकास होता है।
(4) जल (Water)
जल भी पशुओं के पोषण का एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटक है। विभिन्न पशुओं को उनकी आयु, आकार और उत्पादन क्षमता के अनुसार अलग-अलग मात्रा में जल की आवश्यकता होती है।
कुक्कुट पालन (Poultry)
भारत में कुक्कुट पालन के अंतर्गत देशी तथा विदेशी नस्लों का पालन किया जाता है।
देशी नस्लें— असील, बसरा।
विदेशी एवं संकर नस्लें— ILS-82, B-77, HH-260, ISL-82, व्हाइट लेगहॉर्न, रोड आइलैंड रेड, लाइट ससेक्स आदि।
ये नस्लें प्रति वर्ष औसतन 200 अंडे देने की क्षमता रखती हैं।
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मत्स्य उत्पादन (Fish Production)
कृत्रिम या प्राकृतिक जलीय पारितंत्र का निर्माण कर मछलियों का पालन-पोषण करके उनसे उत्पादन प्राप्त करने की प्रक्रिया को मत्स्य उत्पादन कहा जाता है।
मत्स्य पालन (Pisciculture)
मछलियों के व्यावसायिक उत्पादन के लिए उनका पालन, प्रजनन तथा अंडों से नई मछलियों का उत्पादन करना मत्स्य पालन कहलाता है।
मृदु जल की मछलियाँ
तालाबों, नहरों, नदियों और झीलों में पाई जाने वाली मछलियाँ मृदु जल की मछलियाँ कहलाती हैं।
उदाहरण— रोहू, कतला, झींगा आदि।
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लवणीय जल की मछलियाँ
समुद्रों में पाई जाने वाली मछलियाँ लवणीय जल की मछलियाँ कहलाती हैं।
उदाहरण— सालमन, बॉम्बे डक, पॉमफ्रेट, सार्डिन, व्हेल, शार्क, हिलसा, मैक्रेल, सिल्वर वेलिज, बील फिश आदि।
मधुमक्खी पालन (Beekeeping)
मधु अर्थात शहद के उत्पादन के लिए मधुमक्खियों के पालन-पोषण की प्रक्रिया को मधुमक्खी पालन कहा जाता है। यह एक लघु उद्योग है, जिसे कम पूँजी में शुरू किया जा सकता है।
मधु उत्पादन के लिए मुख्य रूप से निम्न प्रजातियों का पालन किया जाता है— ऐसिस सेराना इंडिका, ऐसिस डोरसेटा (सैल मक्खी), ऐसिस फ्लोरिया (छोटी मक्खी) तथा इटालियन प्रजाति की ऐसिस मेलिफेरा।
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निष्कर्ष (Conclusion)
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