Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi | उत्तक (Tissue) Free PDF Notes Download

Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi – उत्तक (Tissue) के इस पोस्ट में हम आपको NCERT पाठ्यक्रम पर आधारित, सरल, स्पष्ट और परीक्षा-उपयोगी संपूर्ण नोट्स प्रदान कर रहे हैं। ये नोट्स खास तौर पर CBSE, Bihar Board, UP Board तथा अन्य राज्य बोर्डों के हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए तैयार किए गए हैं, ताकि वे इस अध्याय की हर अवधारणा को आसान भाषा में समझ सकें और बोर्ड परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकें।

इस अध्याय में हमने पादप ऊतक और जंतु ऊतक दोनों का विस्तृत अध्ययन किया है। यहाँ आप सीखेंगे – पादप ऊतकों के प्रकार (विभज्योतक एवं स्थायी ऊतक), मृदूतक, स्थूलकोण ऊतक, दृढ़ ऊतक, जटिल ऊतक (जाइलम–फ्लोएम) तथा विशिष्ट ऊतक की संरचना और कार्य। साथ ही, जंतु ऊतकों में एपिथीलियम, संयोजी ऊतक, स्नायु–कण्डरा, कंकाल ऊतक, तरल ऊतक (रक्त व लसीका), पेशीय ऊतक तथा तंत्रिका ऊतक को स्पष्ट व्याख्या और उपयुक्त उदाहरणों सहित समझाया गया है।

इसके अतिरिक्त आप सीखेंगे – विभज्योतक के प्रकार (शीर्षस्थ, पार्श्व, अंतर्वेशी), स्थायी ऊतक के उपविभाग, जाइलम–फ्लोएम के घटकों का कार्य, अस्थि और उपास्थि की संरचना, RBC–WBC–Platelets के कार्य, तंत्रिका कोशिका की संरचना (साइटन, डेंड्राइट, एक्सॉन, माइलिन शीथ) और पादप तथा जंतु ऊतकों के बीच मुख्य अंतर।

हर विषय को आसान भाषा, तालिकाओं, मुख्य बिंदुओं (Key Points) और परीक्षा-दृष्टि से महत्वपूर्ण व्याख्याओं सहित प्रस्तुत किया गया है, ताकि विद्यार्थी इस अध्याय को बिना किसी कठिनाई के समझ सकें और परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकें।

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Table of Contents

Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi

Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi
Class 9 Biology Chapter 2 Notes in Hindi

ऊतक (Tissue) किसे कहते हैं?

समान प्रकृति और समान कार्य करने वाली कोशिकाओं के समूह को ऊतक (Tissue) कहा जाता है। जब एक जैसी या संबंधित कोशिकाएं मिलकर किसी विशेष कार्य को करने के लिए संगठित होती हैं, तब वे एक ऊतक (Tissue) का निर्माण करती हैं। ऊतक के कारण बहुकोशिकीय जीवों में अलग-अलग कार्यों का विभाजन आसानी से हो जाता है।

जीवों में ऊतक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

  • पादप ऊतक (Plant Tissues)
  • जंतु ऊतक (Animal Tissues)

1. पादप ऊतक (Plant Tissues) किसे कहते हैं?

पौधों में उपस्थित कोशिकाओं के ऐसे समूह जो विशेष कार्य करते हैं, पादप ऊतक (Plant Tissues) कहलाते हैं। ये ऊतक पौधों के विभिन्न भागों में पाए जाते हैं और वृद्धि, सहारा, जल का परिवहन, खनिजों का परिवहन तथा भोजन के परिवहन जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में सहायता करते हैं।

पादप ऊतक मुख्यतः दो वर्गों में विभाजित होते हैं –

  • विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissue)
  • स्थायी ऊतक (Permanent Tissue)

1. विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissue) किसे कहते हैं?

पौधों के उन वृद्धि वाले क्षेत्रों में पाए जाने वाले ऊतक, जिनकी कोशिकाएं लगातार विभाजित होकर नई कोशिकाओं का निर्माण करती हैं, विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissue) कहलाते हैं। इन ऊतकों की कोशिकाओं में सक्रिय कोशिका विभाजन की क्षमता होती है। नई कोशिकाओं के बनने के कारण पौधों के विभिन्न भागों में वृद्धि होती है।

विभज्योतक ऊतक के कार्य (Functions of Meristematic Tissue)

विभज्योतक ऊतक पौधों की वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसकी कोशिकाएं विभाजित होकर नई कोशिकाओं का निर्माण करती हैं, जो आगे चलकर विभिन्न प्रकार के स्थायी ऊतकों में परिवर्तित हो सकती हैं।

इसके प्रमुख कार्य हैं –

  • पौधों में नई कोशिकाओं का निर्माण करना।
  • पौधों की लंबाई और मोटाई में वृद्धि करना।
  • पौधों के विभिन्न भागों के विकास में सहायता करना।
  • नई शाखाओं और अन्य संरचनाओं के निर्माण में सहायता करना।

विभज्योतक ऊतक के प्रकार (Types of Meristematic Tissue)

विभज्योतक ऊतक का वर्गीकरण मुख्यतः दो आधारों पर किया जाता है –

  1. उत्पत्ति के आधार पर (Based on Origin)
  2. स्थिति के आधार पर (Based on Position)

1. उत्पत्ति के आधार पर विभज्योतक के प्रकार (Types Based on Origin)

a. प्राथमिक विभज्योतक (Primary Meristem)

जो विभज्योतक पौधे की प्राथमिक वृद्धि में सहायता करते हैं और पौधे के प्रारंभिक विकास से संबंधित होते हैं, उन्हें प्राथमिक विभज्योतक (Primary Meristem) कहते हैं। ये मुख्य रूप से पौधे के उन भागों में पाए जाते हैं जहाँ प्रारंभिक वृद्धि होती है और इनकी गतिविधि से पौधे की लंबाई बढ़ती है।

b. द्वितीयक विभज्योतक (Secondary Meristem)

जो विभज्योतक पौधे के परिपक्व भागों में बाद में सक्रिय होते हैं और मुख्य रूप से पौधे की मोटाई या द्वितीयक वृद्धि (Secondary Growth) में सहायता करते हैं, उन्हें द्वितीयक विभज्योतक (Secondary Meristem) कहते हैं। कैंबियम (Cambium) और कॉर्क कैंबियम (Cork Cambium) इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

2. स्थिति के आधार पर विभज्योतक के प्रकार (Types Based on Position)

पौधे में उनकी स्थिति के आधार पर विभज्योतक ऊतक तीन प्रकार के होते हैं –

  • शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem)
  • पार्श्व विभज्योतक (Lateral Meristem)
  • अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem)

a. शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem)

पौधों की जड़ और तने के शीर्ष भाग में पाया जाने वाला विभज्योतक शीर्षस्थ विभज्योतक (Apical Meristem) कहलाता है। यह मुख्य रूप से जड़ और तने के अग्र भाग में स्थित होता है और इसकी कोशिकाओं के विभाजन से पौधे की लंबाई में वृद्धि होती है।

b. पार्श्व विभज्योतक (Lateral Meristem)

पौधों के तने और जड़ के पार्श्व या किनारे वाले भागों में पाया जाने वाला विभज्योतक पार्श्व विभज्योतक (Lateral Meristem) कहलाता है। इसके कारण पौधों के तने और जड़ की मोटाई में वृद्धि होती है। कैंबियम इसका प्रमुख उदाहरण है।

c. अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem)

पौधों में गांठों (Nodes) या अंतर-गांठों (Internodes) के पास पाया जाने वाला विभज्योतक अंतर्वेशी विभज्योतक (Intercalary Meristem) कहलाता है। यह विशेष रूप से घास जैसे पौधों में पाया जाता है और तने के कुछ भागों की लंबाई में तेजी से वृद्धि करने में सहायता करता है। कटने के बाद घास की दोबारा वृद्धि में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2. स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) किसे कहते हैं?

विभज्योतक की कोशिकाओं के विभाजन और विकास के बाद जब वे विशेष कार्य के लिए विशेषीकृत हो जाती हैं और सामान्यतः विभाजन करने की क्षमता खो देती हैं, तब उनसे बनने वाले ऊतकों को स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) कहा जाता है। ये ऊतक पौधों के तने, जड़, पत्तियों और अन्य भागों में पाए जाते हैं तथा अपने-अपने विशेष कार्य करते हैं।

स्थायी ऊतकों की कोशिकाओं में विभज्योतक की कोशिकाओं की तुलना में विभाजन की क्षमता बहुत कम या समाप्त हो जाती है। इनके आकार, संरचना और कार्य में भी विशेष परिवर्तन हो जाते हैं।

उत्पत्ति के आधार पर स्थायी ऊतकों के प्रकार (Types Based on Origin)

उत्पत्ति के आधार पर स्थायी ऊतकों को मुख्य रूप से दो प्रकारों में समझा जा सकता है –

1. प्राथमिक स्थायी ऊतक (Primary Permanent Tissue)

प्राथमिक विभज्योतक (Primary Meristem) से बनने वाली कोशिकाओं के विभेदन और विशेषीकरण के बाद बनने वाले स्थायी ऊतक को प्राथमिक स्थायी ऊतक (Primary Permanent Tissue) कहा जाता है। ये पौधे की प्राथमिक वृद्धि और उसके प्रारंभिक भागों के निर्माण से संबंधित होते हैं।

2. द्वितीयक स्थायी ऊतक (Secondary Permanent Tissue)

द्वितीयक या पार्श्व विभज्योतक (Secondary or Lateral Meristem) से बनने वाली कोशिकाओं के विभेदन के बाद बनने वाले स्थायी ऊतक को द्वितीयक स्थायी ऊतक (Secondary Permanent Tissue) कहा जाता है। ये मुख्य रूप से पौधे की द्वितीयक वृद्धि और मोटाई से संबंधित होते हैं।

संरचना और कार्य के आधार पर स्थायी ऊतकों के प्रकार (Types of Permanent Tissue)

स्थायी ऊतकों को उनकी संरचना और कार्य के आधार पर मुख्यतः तीन प्रकारों में विभाजित किया जाता है –

  • सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue)
  • जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue)
  • विशिष्ट स्थायी ऊतक (Specialized Permanent Tissue)

1. सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue) किसे कहते हैं?

ऐसे स्थायी ऊतक जो मुख्यतः एक ही प्रकार की समान कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं, सरल स्थायी ऊतक (Simple Permanent Tissue) कहलाते हैं। इनकी कोशिकाओं की संरचना सामान्यतः समान होती है और वे मिलकर एक या कुछ संबंधित कार्यों को पूरा करती हैं।

सरल स्थायी ऊतक मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं –

  • मृदूतक (Parenchyma)
  • स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma)
  • दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma)

मृदूतक (Parenchyma) किसे कहते हैं?

पतली कोशिका भित्ति वाली जीवित कोशिकाओं से बना स्थायी ऊतक, जो पौधों के कोमल भागों में पाया जाता है, मृदूतक (Parenchyma) कहलाता है। इसकी कोशिकाओं के बीच सामान्यतः अंतरकोशिकीय स्थान (Intercellular Spaces) पाए जाते हैं। यह पौधों के विभिन्न भागों में भोजन और अन्य पदार्थों के भंडारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

मृदूतक मुख्य रूप से तना, जड़, पत्तियों, फलों और बीजों के विभिन्न भागों में पाया जाता है।

यदि मृदूतक की कोशिकाओं में हरितलवक (Chloroplast) उपस्थित हों, तो इसे हरितोतक या क्लोरेन्काइमा (Chlorenchyma) कहते हैं। यह प्रकाश संश्लेषण में सहायता करता है।

जब जलीय पौधों में मृदूतक की कोशिकाओं के बीच बड़े वायु-स्थान (Air Spaces) पाए जाते हैं, तो इसे ऐरेन्काइमा (Aerenchyma) कहा जाता है। इन बड़े वायु-स्थानों के कारण जलीय पौधों को पानी में तैरने में सहायता मिलती है।

स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) किसे कहते हैं?

ऐसा स्थायी ऊतक जिसकी जीवित कोशिकाओं की कोशिका भित्ति के कोनों पर सेल्यूलोज और पेक्टिन का असमान जमाव होता है, स्थूलकोण ऊतक (Collenchyma) कहलाता है। इसकी कोशिकाएं पौधे के बढ़ते हुए भागों को सहारा देने के साथ-साथ उन्हें लचीला बनाए रखने में सहायता करती हैं।

यह ऊतक मुख्य रूप से पत्तियों के वृन्त (Petiole) और युवा तनों में, विशेषकर बाह्यत्वचा (Epidermis) के नीचे पाया जाता है।

स्थूलकोण ऊतक पौधों को –

  • यांत्रिक मजबूती (Mechanical Strength) प्रदान करता है।
  • लचीलापन (Flexibility) बनाए रखने में सहायता करता है।
  • पौधे के कोमल भागों को बिना टूटे मुड़ने में सहायता करता है।

दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma) किसे कहते हैं?

ऐसा स्थायी ऊतक जिसकी कोशिकाओं की कोशिका भित्तियाँ बहुत मोटी और लिग्निनयुक्त (Lignified) होती हैं, दृढ़ ऊतक (Sclerenchyma) कहलाता है। इसकी कोशिकाएं सामान्यतः परिपक्व अवस्था में मृत होती हैं और इनकी मोटी कोशिका भित्ति पौधे को मजबूती प्रदान करती है।

दृढ़ ऊतक मुख्य रूप से पौधों के परिपक्व और कठोर भागों में पाया जाता है। यह पौधों को कठोरता और यांत्रिक मजबूती प्रदान करता है।

दृढ़ ऊतक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं –

  • तंतु (Fibres)
  • स्लेरेड्स या स्टोन सेल्स (Sclereids / Stone Cells)

दृढ़ ऊतक तंतु (Fibres)

दृढ़ ऊतक तंतु (Fibres) लंबी, पतली और सामान्यतः दोनों सिरों पर नुकीली कोशिकाओं से बने होते हैं। इनकी कोशिका भित्तियाँ मोटी और लिग्निनयुक्त होती हैं। ये पौधों के विभिन्न भागों में पाए जाते हैं और पौधे को यांत्रिक मजबूती प्रदान करते हैं।

इसके उदाहरण हैं –

  • जूट (Jute)
  • पटसन (Jute/Flax, संदर्भ के अनुसार)
  • सन (Sunn Hemp)
  • फ्लैक्स (Flax)

स्लेरेड्स या स्टोन सेल्स (Sclereids / Stone Cells)

स्लेरेड्स (Sclereids) दृढ़ ऊतक की ऐसी कोशिकाएं हैं जिनका आकार अपेक्षाकृत छोटा या अनियमित हो सकता है और जिनकी कोशिका भित्तियाँ बहुत मोटी तथा लिग्निनयुक्त होती हैं। ये पौधों के विभिन्न भागों को कठोरता और मजबूती प्रदान करती हैं।

इसके प्रमुख उदाहरण हैं –

  • नाशपाती के गूदे में पाए जाने वाले कठोर कण
  • कुछ फलों और बीजों के कठोर आवरण
  • बीजों तथा फलों की कठोर बाहरी संरचनाएं

इन भागों में पाई जाने वाली कठोरता मुख्य रूप से स्लेरेड्स या स्टोन सेल्स की मोटी और लिग्निनयुक्त कोशिका भित्तियों के कारण होती है।

2. जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue) किसे कहते हैं?

ऐसे स्थायी ऊतक जो एक से अधिक प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं और जिनकी सभी कोशिकाएं मिलकर एक विशेष कार्य करती हैं, उन्हें जटिल स्थायी ऊतक (Complex Permanent Tissue) कहा जाता है। इनमें कुछ कोशिकाएं जीवित तथा कुछ मृत हो सकती हैं।

इन ऊतकों का मुख्य कार्य पौधों में जल, खनिज लवण तथा भोजन का परिवहन (Conduction) करना है।

पौधों में पाए जाने वाले प्रमुख जटिल स्थायी ऊतक हैं –

  • जाइलम (Xylem)
  • फ्लोएम (Phloem)

1. जाइलम (Xylem) किसे कहते हैं?

ऐसा संवहन ऊतक (Conducting Tissue) जो पौधों की जड़ों से लेकर तने और पत्तियों तक पाया जाता है तथा मुख्य रूप से जल और खनिज लवणों का जड़ों से पौधे के ऊपरी भागों तक परिवहन करता है, उसे जाइलम (Xylem) कहते हैं। जल और खनिज लवण पौधों में प्रकाश संश्लेषण सहित कई आवश्यक जैविक प्रक्रियाओं के लिए महत्वपूर्ण होते हैं।

जाइलम ऊतक चार प्रकार की कोशिकाओं से मिलकर बना होता है –

  • ट्रैकिड्स (Tracheids)
  • जाइलम नलिकाएं या वाहिकाएं (Xylem Vessels)
  • जाइलम तंतु (Xylem Fibres)
  • जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma)

ट्रैकिड्स (Tracheids)

ट्रैकिड्स लंबी, पतली और नुकीले सिरों वाली मृत कोशिकाएं होती हैं। इनकी कोशिका भित्तियां मोटी तथा लिग्निनयुक्त (Lignified) होती हैं। ये मुख्य रूप से पौधों में जल और खनिज लवणों के परिवहन में सहायता करती हैं तथा पौधे को यांत्रिक मजबूती भी प्रदान करती हैं।

जाइलम नलिकाएं या वाहिकाएं (Xylem Vessels)

जाइलम नलिकाएं या वाहिकाएं कई मृत, लंबी और चौड़ी कोशिकाओं के क्रमिक रूप से जुड़ने से बनी नलिकाकार संरचनाएं होती हैं। इन कोशिकाओं के बीच की अंतिम भित्तियों में छिद्र या खुला भाग हो सकता है, जिससे जल आसानी से एक कोशिका से दूसरी कोशिका में प्रवाहित हो सकता है। इनका मुख्य कार्य जल और खनिज लवणों का परिवहन करना है।

जाइलम तंतु (Xylem Fibres)

जाइलम तंतु मोटी और लिग्निनयुक्त कोशिका भित्ति वाली मृत कोशिकाओं से बने होते हैं। इनका मुख्य कार्य जाइलम को यांत्रिक मजबूती और सहारा प्रदान करना है।

जाइलम मृदूतक (Xylem Parenchyma)

जाइलम मृदूतक जीवित कोशिकाओं से बना होता है और इसकी कोशिका भित्तियां सामान्यतः पतली होती हैं। यह मुख्य रूप से भोजन का संग्रह करता है तथा कुछ पौधों में जल और अन्य पदार्थों के पार्श्व परिवहन में भी सहायता करता है।

2. फ्लोएम (Phloem) किसे कहते हैं?

फ्लोएम वह संवहन ऊतक (Conducting Tissue) है जो पौधों की पत्तियों में प्रकाश संश्लेषण द्वारा बने भोजन या कार्बनिक पदार्थों को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है। फ्लोएम में भोजन का परिवहन आवश्यकता के अनुसार स्रोत (Source) से उपयोग या भंडारण वाले भागों (Sink) की ओर हो सकता है। इसलिए इसका परिवहन केवल ऊपर से नीचे की दिशा तक सीमित नहीं होता।

फ्लोएम ऊतक मुख्यतः चार प्रकार की संरचनाओं से मिलकर बना होता है –

  • चालनी नलिका (Sieve Tube)
  • सहचर कोशिका या सखी कोशिका (Companion Cell)
  • फ्लोएम मृदूतक (Phloem Parenchyma)
  • फ्लोएम तंतु (Phloem Fibres)

चालनी नलिका (Sieve Tube)

चालनी नलिका लंबी, पतली और नलिकाकार संरचना होती है, जो कई चालनी तत्वों (Sieve Tube Elements) के एक-दूसरे से जुड़े होने से बनती है। दो क्रमिक चालनी तत्वों के बीच की अंतिम भित्ति में छिद्रयुक्त संरचना होती है, जिसे चालनी पट (Sieve Plate) कहा जाता है। इसके माध्यम से भोजन का परिवहन एक चालनी तत्व से दूसरे तक होता है।

चालनी नलिकाओं की कोशिकाएं परिपक्व अवस्था में जीवित होती हैं, लेकिन इनमें सामान्यतः नाभिक अनुपस्थित होता है।

सखी कोशिका (Companion Cell)

सखी कोशिकाएं चालनी नलिकाओं के साथ closely जुड़ी हुई जीवित कोशिकाएं होती हैं। इनमें नाभिक उपस्थित रहता है और ये चालनी नलिकाओं के कार्य को नियंत्रित करने तथा भोजन के परिवहन में सहायता करती हैं। सखी कोशिकाएं चालनी नलिकाओं की आवश्यक ऊर्जा और अन्य जैविक सहायता उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

फ्लोएम मृदूतक (Phloem Parenchyma)

फ्लोएम मृदूतक जीवित और पतली कोशिका भित्ति वाली कोशिकाओं से बना होता है। यह भोजन तथा अन्य पदार्थों के भंडारण में सहायता करता है और कुछ पौधों में पदार्थों के पार्श्व परिवहन में भी भूमिका निभाता है।

फ्लोएम तंतु (Phloem Fibres)

फ्लोएम तंतु दृढ़ ऊतक जैसे मोटी भित्ति वाले तंतुओं से बने होते हैं। ये सामान्यतः परिपक्व अवस्था में मृत होते हैं और फ्लोएम को यांत्रिक मजबूती तथा सहारा प्रदान करते हैं।

फ्लोएम के चारों प्रमुख घटकों में फ्लोएम तंतु मृत होते हैं, जबकि चालनी नलिकाएं, सखी कोशिकाएं और फ्लोएम मृदूतक सामान्यतः जीवित होते हैं।

3. विशिष्ट स्थायी ऊतक (Specialized Permanent Tissue) किसे कहते हैं?

पौधों में कुछ ऊतक या कोशिकीय संरचनाएं ऐसे विशेष कार्य करती हैं जिनमें विशिष्ट पदार्थों का स्राव या भंडारण शामिल होता है। ऐसे ऊतकों को विशिष्ट स्थायी ऊतक (Specialized Permanent Tissue) कहा जाता है।

इनमें मुख्य रूप से ऐसे ऊतक शामिल होते हैं जो लेटेक्स, रेजिन, तेल तथा अन्य विशेष पदार्थों के निर्माण, स्राव या भंडारण में सहायता करते हैं।

विशिष्ट स्थायी ऊतक के प्रमुख उदाहरण हैं –

  • लेटीसिफ़ेरस ऊतक (Laticiferous Tissue)
  • ग्रंथिल ऊतक (Glandular Tissue)

i. लेटीसिफ़ेरस ऊतक (Laticiferous Tissue)

कुछ पौधों में लेटेक्स (Latex) नामक दूधिया या गाढ़ा द्रव पाया जाता है। लेटेक्स का निर्माण और स्राव करने वाली विशेष नलिकाकार या कोशिकीय संरचनाओं को लेटीसिफ़ेरस ऊतक (Laticiferous Tissue) कहा जाता है।

रबर के पौधे (Rubber Plant) जैसे कुछ पौधों में लेटेक्स पाया जाता है। लेटेक्स कई पौधों में शाकाहारी जीवों से रक्षा और चोट लगने पर पौधे के घाव को बंद करने जैसी सुरक्षा संबंधी भूमिकाओं में सहायता कर सकता है।

ii. ग्रंथिल ऊतक (Glandular Tissue)

पौधों में ऐसे विशेष ऊतक या कोशिकाएं जो तेल, रेजिन, सुगंधित पदार्थ (Essential Oils) तथा अन्य रासायनिक पदार्थों का निर्माण या स्राव करती हैं, उन्हें ग्रंथिल ऊतक (Glandular Tissue) कहा जाता है।

ये पौधों के विभिन्न भागों, जैसे पत्तियों, तनों और फूलों में पाए जा सकते हैं। इनके द्वारा स्रावित पदार्थ पौधों को कीटों और अन्य जीवों से रक्षा, गंध उत्पन्न करने तथा कुछ स्थितियों में परागण के लिए आकर्षण में सहायता कर सकते हैं।

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2. जंतु ऊतक (Animal Tissues) किसे कहते हैं ?

जंतुओं में एक समान प्रकार की कोशिकाओं के समूह से बने ऊतकों को जंतु ऊतक (Animal Tissues) कहा जाता है।
ये ऊतक शरीर में संरक्षण, संचरण, नियंत्रण, गति, स्राव, अवशोषण जैसे अनेक महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।

जंतु ऊतक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं—

  1. एपिथीलियम ऊतक (Epithelial Tissue)
  2. संयोजी ऊतक (Connective Tissue)
  3. पेशीय ऊतक (Muscular Tissue)
  4. तंत्रिका ऊतक (Nervous Tissue)

1. एपिथीलियम ऊतक किसे कहते हैं ?

जो जंतु ऊतक शरीर के बाहरी तथा आंतरिक अंगों की रक्षा करने के लिए एक सुरक्षात्मक आवरण (Protective covering) बनाते हैं, उन्हें एपिथीलियम ऊतक कहते हैं।
यह आहार नाल, फेफड़ों, हृदय, मुख–गुहा तथा विभिन्न नलिकाओं की भीतरी सतह पर पाया जाता है।

एपिथीलियम ऊतक के कार्य

  • यह ऊतक शरीर को जीवाणुओं, रासायनिक पदार्थों, विकिरणों तथा अन्य हानिकारक पदार्थों से बचाता है।
  • एपिथीलियम ऊतक में उपस्थित ग्रंथियां पाचक रस, दूध आदि विशिष्ट पदार्थों का स्राव करती हैं।
  • यह ऊतक उत्सर्जन नलिकाओं में पाया जाता है और उत्सर्जन क्रिया को संभव बनाता है।
  • इसकी कोशिकाएं तंत्रिका आवेगों को ग्रहण कर सकती हैं, जिससे संवेदना प्राप्त होती है।
  • जननांगों में उपस्थित कुछ एपिथीलियम ऊतक युग्मक निर्माण में सहायता करते हैं।

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एपिथीलियम ऊतक के प्रकार

एपिथीलियम ऊतक मुख्यतः सात प्रकार के होते हैं—

A. शल्की एपिथीलियम किसे कहते हैं ?

यह ऊतक चपटी, प्लेट जैसी, षट्भुजी कोशिकाओं से बना होता है। यह फेफड़ों की आंतरिक दीवारों, वृक्क नलिकाओं के बोमैन कैप्सूल, आंतरिक कान की झिल्ली, रक्त वाहिनियों की भीतरी दीवारों तथा मुख गुहा में पाया जाता है।

कार्य –

  • यह आंतरिक अंगों को सुरक्षा देता है।
  • विसरण (Diffusion) क्रिया में सहायता करता है।

B. घनाकार एपिथीलियम किसे कहते हैं ?

यह ऊतक घनाकार कोशिकाओं से बना होता है। यह मुख्य रूप से गुर्दे और लार ग्रंथियों में पाया जाता है।

कार्य –

  • पदार्थों का स्राव (Secretion)
  • पदार्थों का अवशोषण (Absorption)
  • संबंधित अंगों को सहारा (Support) प्रदान करना

C. स्तम्भी एपिथीलियम किसे कहते हैं ?

यह ऊतक लंबी, खंभे जैसी (Column-like) कोशिकाओं से बना होता है। यह छोटी आंत की आंतरिक दीवार पर पाया जाता है, जहाँ कोशिकाओं की ऊपरी सतह पर माइक्रोविल्ली होती है। इसके अतिरिक्त यह गला, आमाशय, आंत तथा मादा प्राणियों की अंडवाहिनियों में भी पाया जाता है।

D. पक्षमल एपिथीलियम किसे कहते हैं ?

यह ऊतक घनाकार और स्तंभाकार एपिथीलियम के रूपांतरण से बनता है। इसकी कोशिकाओं पर पक्ष्म (Cilia) पाए जाते हैं, जो पदार्थों को एक दिशा में ले जाने में सहायता करते हैं। यह नाक की आंतरिक दीवारों, ट्रेकिया (श्वासनली), अंडवाहिनी तथा मेंढक के मुख गुहा में पाया जाता है।

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E. ग्रंथिल एपिथीलियम किसे कहते हैं ?

यह स्तंभाकार एपिथीलियम का रूपांतरित रूप है, जो विशिष्ट रासायनिक पदार्थों का स्राव करता है।
इसके उदाहरण हैं—

  • सफेद ग्रंथि
  • सिबेसियस (Sebaceous) ग्रंथि
  • लार ग्रंथि

F. संवेदी एपिथीलियम किसे कहते हैं ?

यह भी स्तंभाकार एपिथीलियम का ही परिवर्तित रूप है। यह ऊतक संवेदी कोशिकाओं में पाया जाता है।
उदाहरण—

  • जीभ की स्वाद कलिकाएँ
  • कान की आंतरिक झिल्ली
  • नाक की घ्राण कलिकाएँ (Olfactory Lobes)

G. स्तरित एपिथीलियम किसे कहते हैं ?

यह ऊतक कोशिकाओं की कई परतों से मिलकर बना होता है। यह मुख्य रूप से त्वचा में पाया जाता है और शरीर को घर्षण, चोट तथा संक्रमणों से बचाता है।

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2. संयोजी ऊतक किसे कहते हैं ?

वैसा जंतु ऊतक जो जीव–शरीर के विभिन्न अंगों, ऊतकों और संरचनाओं को जोड़ने, सहारा देने और उन्हें सुरक्षित रखने का कार्य करता है, संयोजी ऊतक (Connective Tissue) कहलाता है।
इस ऊतक के बीच मैट्रिक्स अधिक मात्रा में होता है, जो इसे मजबूती और लचीलापन प्रदान करता है।

संयोजी ऊतक के कार्य

  • यह शरीर के अंगों और शारीरिक संरचनाओं को जोड़ता है।
  • यह अंगों तथा अन्य ऊतकों के चारों ओर रक्षात्मक आवरण बनाता है।
  • यह ऊतक शरीर को सूक्ष्मजीवों के संक्रमण से बचाता है।
  • यह घायल तथा अनावश्यक ऊतकों को हटाने में सहायता करता है।
  • यह शरीर में कंकाल की रचना करता है और शरीर को आकार देता है।

संयोजी ऊतक के प्रकार

संयोजी ऊतक मुख्यतः चार प्रकार के होते हैं—
A. वास्तविक संयोजी ऊतक
B. कंकाल ऊतक
C. द्रव संयोजी ऊतक
D. विशेष संयोजी ऊतक

A. वास्तविक संयोजी ऊतक (Areolar/True Connective Tissue)

इसे पाँच भागों में बाँटा गया है—

a. अंतरालीय संयोजी ऊतक किसे कहते हैं ?

यह वास्तविक संयोजी ऊतक शरीर के अधिकांश भागों में पाया जाता है। इसमें चार प्रकार की कोशिकाएँ— फाइब्रोब्लास्ट कोशिकाएँ, मैक्रोफेज, मास्ट कोशिकाएँ, लिम्फ कोशिकाएँ और दो प्रकार के तंतु— कोलेजन तंतु, इलास्टिन तंतु पाए जाते हैं।  यह ऊतक अंगों को ढकने, सहारा देने और उन्हें जगह पर बनाए रखने में मदद करता है।

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b. पीत लचीले ऊतक किसे कहते हैं ?

यह वास्तविक संयोजी ऊतक पीले एवं अत्यंत लचीले तंतुओं से बना होता है।
यह मुख्यतः— धमनियों की दीवारों, ब्रांकिओल्स, कंकाल के पास में पाया जाता है।
इसका मुख्य कार्य त्वचा को उसके नीचे स्थित मांसपेशियों से जोड़ना तथा लचीलापन प्रदान करना है।

c. श्वेत तंतुवत ऊतक किसे कहते हैं ?

यह कोलेजन तंतुओं के सघन समूह से बनता है।
इसका मुख्य कार्य— मांसपेशियों को हड्डियों से मजबूती से जोड़ना है।

यह ऊतक— रीढ़ रज्जु (Spinal cord), मस्तिष्क की ड्यूरा मैटर परत में भी पाया जाता है।

d. एडिपोज या वसीय ऊतक किसे कहते हैं ?

यह शरीर के गहरे भागों, अस्थि मज्जा और आंतरिक अंगों के आसपास पाया जाता है। इसमें मौजूद वसा कण (Fat globules) शरीर को— ठंड से बचाते हैं, ऊर्जा का भंडार बनाते हैं, आंतरिक अंगों को गद्दी प्रदान करते हैं |
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e. जलावत ऊतक किसे कहते हैं ?

यह वास्तविक संयोजी ऊतक तारों जैसे आकार वाली कोशिकाओं से मिलकर बना होता है।
इन कोशिकाओं के कोनों से जीवद्रव्य के प्रवर्ध (Processes) निकलकर जाल (Network) बनाते हैं।
यह ऊतक— प्लीहा (Spleen), अस्थि मज्जा, यकृत (Liver) में पाया जाता है और सहारा व रक्षा का कार्य करता है।

B. कंकाल ऊतक किसे कहते हैं ?

वह संयोजी ऊतक जो शरीर को एक निश्चित आकृति और संरचना प्रदान करता है, कंकाल ऊतक (Skeletal Tissue) कहलाता है। यह ऊतक शरीर को सहारा देता है और गति में मदद करता है।

कंकाल ऊतक के कार्य

  • शरीर को निश्चित आकार और संरचना देता है।
  • शरीर के कोमल अंगों जैसे—मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े—को सुरक्षित रखता है।
  • शरीर की गति (Movement) में सहायता करता है।

कंकाल ऊतक के प्रकार

कंकाल ऊतक दो प्रकार के होते हैं—

  1. अस्थि (Bone)
  2. उपास्थि (Cartilage)

अस्थि किसे कहते हैं ?

अस्थि अपेक्षाकृत अत्यधिक कठोर और मजबूत होती है। इसकी कठोरता का कारण इसमें उपस्थित—कैल्शियम, मैग्नीशियम के लवण हैं। अस्थि अपारगम्य होती है और इसके मैट्रिक्स में अकार्बनिक लवण पाए जाते हैं। इसमें उपस्थित ऑस्टियोसाइट कोशिकाएँ एकल अवस्था में रहती हैं।

अस्थि में— कैनालिकुली नामक पतली नलिकाएँ, आंतरिक गुहा में उपस्थित अस्थि–मज्जा, जिसमें वसा व रक्त–कोशिकाएँ होती हैं, पाई जाती हैं।

उपास्थि किसे कहते हैं ?

उपास्थि अस्थि की तुलना में मुलायम और अधिक लचीला होता है। यह— हड्डियों के जोड़, नाक, कान, ट्रेकिया में पाया जाता है। इसके मैट्रिक्स में कॉनड्रिन (Chondrin) नामक विशेष प्रकार का प्रोटीन होता है। यह पोषक पदार्थों तथा ऑक्सीजन के लिए पारगम्य होता है। इसमें कंड्रोसाइट्स कोशिकाएँ समूहों में पाई जाती हैं। उपास्थि में रक्त की आपूर्ति नहीं होती, इसलिए यह धीरे-धीरे ठीक होता है।

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C. स्नायु और कण्डरा किसे कहते हैं ?

यह एक तंतुवत संयोजी ऊतक है, जो अत्यंत लचीला तथा मजबूत होता है।

  • स्नायु (Ligament) एक हड्डी को दूसरी हड्डी से जोड़ता 
  • कण्डरा (Tendon) मांसपेशियों को हड्डियों से जोड़ने का कार्य करता है।

दोनों ही ऊतक शरीर में गति और स्थिरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

D. तरल संयोजी ऊतक किसे कहते हैं ?

इस ऊतक को परिवहन ऊतक (Transport Tissue) भी कहा जाता है, क्योंकि यह शरीर में— ऑक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड, पोषक पदार्थ, विटामिन, हार्मोन आदि को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाता है। रक्त और लसीका (Lymph) मिलकर तरल संयोजी ऊतक बनाते हैं।

रक्त क्या है ?

जो तरल संयोजी ऊतक प्लाज्मा तथा रक्त–कोशिकाओं से मिलकर बनता है, वह रक्त (Blood) कहलाता है।
रक्त में तीन प्रकार की कोशिकाएँ पाई जाती हैं—

1. लाल रक्त कोशिका (Red Blood Cell / RBC / Erythrocyte)

  • यह पीले रंग की कोशिकाएँ होती हैं, जो हीमोग्लोबिन रंजक के कारण लाल दिखाई देती हैं।
  • इसका मुख्य कार्य ऑक्सीजन, पोषक पदार्थ, विटामिन, हार्मोन, और कुछ मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का परिवहन करना है।
  • इसे एरिथ्रोसाइट भी कहते हैं।

2. श्वेत रक्त कोशिका (White Blood Cell / WBC / Leukocyte)

  • यह रंगहीन तथा अनियमित आकार की कोशिकाएँ होती हैं।
  • इसका मुख्य कार्य शरीर को जीवाणुओं और संक्रामक रोगों से बचाना है।
  • इसे ल्यूकोसाइट भी कहा जाता है।

3. बिम्बाणु (Platelets / Thrombocyte)

  • ये रक्त में तुर्क (Disc-like) रूप में पाए जाते हैं और इनकी संख्या बहुत कम होती है।
  • इनका मुख्य कार्य रक्त का थक्का जमाना (Blood Clotting) है।
  • इनकी कमी होने पर घाव का रक्त रुक नहीं पाता।
  • इसका दूसरा नाम थ्रोम्बोसाइट है।

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लसीका या लिम्फ किसे कहते हैं ?

यह रंगहीन तरल संयोजी ऊतक है, जिसमें— प्रोटीन, ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लिंफोसाइट, फागोसाइट जैसी कोशिकाएँ पाई जाती हैं। लसीका पूरे शरीर में एक विशेष तंत्र द्वारा प्रवाहित होती है जिसे लसीका तंत्र (Lymphatic System) कहते हैं।

लसीका के कार्य

  • शरीर में विभिन्न पदार्थों के परिवहन में सहायक।
  • वसा के परिवहन में मदद करता है।
  • शरीर को संक्रामक रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है।

3. पेशीय ऊतक किसे कहते हैं ?

जंतु ऊतक जिनमें संकुचनशील रेशे पाए जाते हैं और जिनमें मैट्रिक्स अनुपस्थित रहता है, उन्हें पेशीय ऊतक (Muscular Tissue) कहा जाता है। इन रेशों में उपस्थित संकुचनशील जीवद्रव्य को सार्कोप्लाज्म (Sarcoplasm) कहते हैं, जो एक झिल्ली से घिरा रहता है जिसे सरकोलिमा (Sarcolemma) कहते हैं।

कार्य के आधार पर पेशीय ऊतक के प्रकार

1. ऐच्छिक पेशी

जिन पेशियों के कार्य पर मस्तिष्क का नियंत्रण होता है, उन्हें ऐच्छिक पेशी कहते हैं।
उदाहरण—हाथ और पैर की पेशियाँ।

2. अनैच्छिक पेशी

जिन पेशियों पर मस्तिष्क का नियंत्रण नहीं होता, वे अनैच्छिक पेशी कहलाती हैं।
उदाहरण—हृदय की पेशियाँ, फेफड़ों की पेशियाँ।

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संरचना के आधार पर पेशीय ऊतकों के प्रकार

1. कंकाल पेशी या रेखित पेशी (Striated/Skeletal Muscles)

  • यह पेशियाँ बंडलों के रूप में लंबी और बेलनाकार कोशिकाओं से बनी होती हैं।
  • इनमें सरकोलिमा पाई जाती है।
  • कोशिकाओं में अनेक केंद्रक पाए जाते हैं, जो परिधि की ओर स्थित होते हैं।
  • यह ऐच्छिक पेशियाँ हैं — हाथों और पैरों में पाई जाती हैं।
  • यह शीघ्र थक जाती हैं।

2. आरेखित पेशी (Smooth/Unstriated Muscles)

  • यह पेशियाँ तंतु जैसी लम्बी कोशिकाओं से बनी होती हैं।
  • इनमें सरकोलिमा अनुपस्थित होता है।
  • इनकी कोशिकाओं में एक केंद्रक पाया जाता है, जो मध्य में स्थित होता है।
  • यह अनैच्छिक पेशियाँ हैं और कभी थकती नहीं।
  • यह पाचन नली, रक्त–वाहिनियों और मूत्राशय में पाई जाती हैं।

3. हृदय की पेशी (Cardiac Muscles)

  • यह पेशियाँ रेखित भी होती हैं, पर अनैच्छिक होती हैं।
  • इनका कार्य निरंतर चलता है और ये कभी थकती नहीं।
  • इन पेशियों में सरकोलिमा भी पाया जाता है।
  • ये केवल हृदय में पाई जाती हैं।

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4. तंत्रिका ऊतक किसे कहते हैं ?

तंत्रिका ऊतक वह ऊतक है जिसका निर्माण तंत्रिका कोशिकाओं (Neuron) से होता है। ये कोशिकाएँ शरीर में तंत्रिका आवेगों (Nerve Impulses) को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने का कार्य करती हैं।
एक न्यूरॉन (तंत्रिका कोशिका) निम्नलिखित प्रमुख भागों से मिलकर बना होता है—

साइटन (Cyton / Cell Body)

यह एक तारे जैसी संरचना होती है। इसके मध्य में एक बड़ा और स्पष्ट केन्द्रक (Nucleus) पाया जाता है। इसी भाग में कोशिका–द्रव्य (Cytoplasm) और अन्य कोशिकांग उपस्थित होते हैं।

डेंड्रॉन (Dendron)

साइटन के बाहरी हिस्से से कई भुजा–नुमा प्रवर्ध (Processes) निकलते हैं, जिन्हें डेंड्रॉन कहते हैं। ये अन्य तंत्रिकाओं से संकेत (Signal) ग्रहण करने में मदद करते हैं।

डेंड्राइट (Dendrite)

डेंड्रॉन से निकलने वाली और भी पतली, शाखित रेखाकार संरचनाएँ डेंड्राइट कहलाती हैं। ये तंत्रिका आवेगों को साइटन तक पहुँचाने का कार्य करती हैं।

एक्सॉन (Axon)

साइटन से एक लंबा प्रवर्ध निकलता है जिसे तंत्रिकाक्ष या एक्सॉन कहते हैं। एक्सॉन तंत्रिका आवेगों को साइटन से दूर, अन्य न्यूरॉन, पेशी या ग्रंथि तक पहुँचाता है।

सिनेप्स (Synapse)

दो तंत्रिका कोशिकाओं के डेंड्राइट्स या एक्सॉन के संपर्क–बिंदु को सिनेप्स कहते हैं। यही वह स्थान है जहाँ एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक आवेग (Impulse) पहुँचता है।

माइलिन शीथ (Myelin Sheath)

एक्सॉन के चारों ओर दोहरी झिल्ली से घिरी कोशिकाओं की परत पाई जाती है, जिसे माइलिन शीथ कहते हैं।
यह एक्सॉन की रक्षा करती है और तंत्रिका आवेगों की गति को बढ़ाती है।

माइलिन शीथ पर कुछ स्थान खुले रहते हैं, जिन्हें रैन–वीयर नोड (Nodes of Ranvier) कहा जाता है।
यह आवेग के तीव्र संचार (Fast Conduction) में सहायक होते हैं।

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तंत्रिका कोशिका के प्रकार

तंत्रिका कोशिकाएँ मुख्यतः तीन प्रकार की होती हैं—

1. संवेदी या अभिवाही तंत्रिका कोशिका (Sensory / Afferent Neuron)

ये तंत्रिका कोशिकाएँ संवेदी अंगों (Skin, Tongue, Eyes आदि) को मस्तिष्क एवं मेरुरज्जु से जोड़ने का कार्य करती हैं। इनका काम संवेदना को मस्तिष्क तक पहुँचाना है।

2. प्रेरक या अपवाही तंत्रिका कोशिका (Motor / Efferent Neuron)

ये तंत्रिका कोशिकाएँ मस्तिष्क या मेरुरज्जु से प्राप्त आदेशों (Impulses) को पेशीय ऊतक या ग्रंथियों तक पहुँचाती हैं। इन्हीं के कारण मांसपेशियाँ सिकुड़ती, फैलती या कार्य करती हैं।

3. संयोजक तंत्रिका कोशिका (Association / Interneuron)

ये तंत्रिका कोशिकाएँ केवल मस्तिष्क और मेरुरज्जु में पाई जाती हैं। इनका मुख्य कार्य— संवेदी तंत्रिका कोशिका
और प्रेरक तंत्रिका कोशिका को आपस में जोड़ना है। इन्हें नाड़ी तंत्र का “लिंक” या “संचार–संचालक” भी कहा जाता है।

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निष्कर्ष (Conclusion):

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